पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया
चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।
रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

No comments:
Post a Comment