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Saturday, 16 January 2021

शब्द में हैं अर्चनाएँ



है अभी तो रक्त में 
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन 
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित 
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये 
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के 
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे 
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर 
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी 
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन