है अभी तो रक्त में
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।
रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।
रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०

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