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Wednesday, 20 January 2021

जीवन कितना जी पाता है


अपने सपनों का इन्द्रजाल, सम्मोहन का महाव्याल

गगन चूमती आशाओं के, मगरी चढ़ते अमित ख्याल
उच्छ्वासों के बीच टँगी भूधर सी लिप्साएँ विशाल
युगों युगों से संघर्षो की यही कहानी दोहराता है
        जीवन कितना जी पाता है

अपने शुष्क मरुस्थल में ही मृगशावक प्यासे दौड़े
अपने घावों को धोने में निज के अश्रु हुए थोड़े
अपने तन में अपनों ने ये रिसते व्रण ही हैं छोड़े
जग के करुण कथानक में क्रन्दन से ही नाता है
             जीवन कितना जी पाता है

इस पाप-पुण्य की पोथी में काले पीले पृष्ठ भरे
कनक घटों के अन्तर में अमिय नहीं हैं जहर भरे
सच के माथे मुकुट चढ़े ये झूँठ जड़े हैं शूल धरे
पल पल के उत्पीड़न में मन टूट टूट जाता है
          जीवन कितना जी पाता है

रंगों से रँगे वितान सभी इक दिन श्याही हो जाते हैं
फूले प्रसून के पादप भी तप कर कहीं बिखर जाते है
श्यामल मेघ सुहानी सुषमा छोड़ छाड़ गल जाते हैं
झर झर करता निर्झर फिर फिर पत्थर से टकराता है
       जीवन कितना जी पाता है

पग पग पर छलती छलना में बाँह थाम कर रखना
तूफानों में इस कश्ती की पतवार थाम कर रखना
कालमेघ के भीषण रव में सिर पर हाथ धरे रहना
तेरी करणा की बरखा में यह मन भींग भींग जाता है
       तब ही जीवन जी पाता है

    रामनारायण सोनी
        २०.०१.२१

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