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Sunday, 7 February 2021
शाम के बाद दिन कहाँ?
मौन छाया बोलती है
Thursday, 21 January 2021
ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं
"ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं"
मौज में जब चलती हैं
खेलती हैं सरोवर मे शान्त जल से
उछालती हैं अलमस्त लहरों को!!
उपवन के फूलों से चुराती हैं
और ला कर उन सुगन्धों को
डाल जाती है नथुनों में मेरे
....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!
सूखे बिखरे पत्तों को बजाती है
सितार की स्वर तंत्रियों सा
जगाती है उनींदी प्रणयिनी को
खोलती है वे शनै शनै
सुबह-सुबह अलसती अँखुड़ियों को
बिखेर देती है फिर अलकों को
उदात्त से उन स्कन्धों पर
देवदार की गहन छाया
ओढ़ ली हो जैसे बाजुओं पर
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!
लहरा देती है चीर को
मंदिरो की ध्वजाओं सा
बिछा देती है स्निग्ध दरियाँ
नदी की देह पर नर्म शैवाल सी
लाती हैं चिट्ठियाँ दूर दूर से
तमाल के भीने पृष्ठों पर
बिन लिखी बिन कही कहानियाँ
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!
उठाती है गोद में रज कणों को
झुलाती है लाड़ प्यार से
चाँद के झूले पर
बिठाती है शिखर के शीश पर
सुवर्णमयी मुकुट सा
सजाती है रंगोलियाँ
फूलों की पंखुड़ियों से
टेसू, कचनार, अमलतास, गुलमोहर की
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।
ये हवाएँ कभी गर्म है, कभी सर्द
कभी अमृत सी पवित्र
कभी जहर सा कहर
कभी जीवन के प्रहर
कभी पंचतत्व में से एक तत्व
सबके जीवन का सत्व
सुनो सब!!!
मत छीनो इनसे इनका निसर्ग
क्योंकि ये जियेंगी भी
तो सिर्फ हमारे, तुम्हारे, सब के लिये
....ये हवाएँ हमें पुकारती हैं
....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।
रामनारायण सोनी
२०.०१.२१
समय नही है
Wednesday, 20 January 2021
जीवन कितना जी पाता है
अपने सपनों का इन्द्रजाल, सम्मोहन का महाव्याल
गगन चूमती आशाओं के, मगरी चढ़ते अमित ख्याल
उच्छ्वासों के बीच टँगी भूधर सी लिप्साएँ विशाल
युगों युगों से संघर्षो की यही कहानी दोहराता है
जीवन कितना जी पाता है
अपने शुष्क मरुस्थल में ही मृगशावक प्यासे दौड़े
अपने घावों को धोने में निज के अश्रु हुए थोड़े
अपने तन में अपनों ने ये रिसते व्रण ही हैं छोड़े
जग के करुण कथानक में क्रन्दन से ही नाता है
जीवन कितना जी पाता है
इस पाप-पुण्य की पोथी में काले पीले पृष्ठ भरे
कनक घटों के अन्तर में अमिय नहीं हैं जहर भरे
सच के माथे मुकुट चढ़े ये झूँठ जड़े हैं शूल धरे
पल पल के उत्पीड़न में मन टूट टूट जाता है
जीवन कितना जी पाता है
रंगों से रँगे वितान सभी इक दिन श्याही हो जाते हैं
फूले प्रसून के पादप भी तप कर कहीं बिखर जाते है
श्यामल मेघ सुहानी सुषमा छोड़ छाड़ गल जाते हैं
झर झर करता निर्झर फिर फिर पत्थर से टकराता है
जीवन कितना जी पाता है
पग पग पर छलती छलना में बाँह थाम कर रखना
तूफानों में इस कश्ती की पतवार थाम कर रखना
कालमेघ के भीषण रव में सिर पर हाथ धरे रहना
तेरी करणा की बरखा में यह मन भींग भींग जाता है
तब ही जीवन जी पाता है
रामनारायण सोनी
२०.०१.२१
Saturday, 16 January 2021
वहीं तो हूँ
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन