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Thursday, 3 December 2015

संजा के स्वप्न




बचपन में भित्ति पर संजा मैं खेली थी
गोबर और और फूलों की पँखुड़ी थी, रोली थी;
सपनों में सजनी बन, करती अठखेली थी
सतरंगी धनुवे को, हिरदे में बो ली थी ।।

घेवर थे, चौपड़ थी, क्वांरे थे, छबड़ी थी

सात्याऔर पावन सत-ऋषि की टोली थी;
अठफूले, द्वारे थे, वृद्धों की जोड़ी थी
जोड़ा था मोरों का, केली की घेडी थी ।।

राजे ओ रजवाड़े, किला-कोट कौवे का

परिचय था अपनों का, आगे के सपनों का;
उमगा जब मन मेरा, भींग गया तन मेरा
धड़कन में पैठ गया, अनचीता साँवरिया ।।


गाल लसै कुमकुम और दर्पण अब भाया है

चंचरीक, चम्पक, सा चुलबुल सरमाया है;
खेल रहा फाग मन, रूमानी रंगों से,
पल-पल में कण-कण में अंगराग छाया है ।।

कंठों में गीतों का अमरस है घुलता

बचपन और यौवन की संधि पर ढलता;
पगलाया पौर-पौर, दबे पाँव उपवन में
तन-मन में, मधुबन में ऋतुराज आया है ।।

तन-मन में, मधुबन में ऋतुराज आया है ।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन