है यही शुभकामना
सामने हो लक्ष्य का संधान जब
सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की धनु-प्रत्यञ्चा तान लो
का का दिन फिर हो उजालों से भरा
तुम सफलता के शिखर को चूम लो।
सूर्य से है मांगली भोर की उजली किरण
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव
बादलों से मांगता मैं स्निग्ध अंतर
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर।
ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों
सत्य ही सम्बल बने, औ सहज व्यवहार हो
हो सरल सी लीक सुन्दर
मंद सी स्मित मनोरम हो मुखर
मंद सी स्मित मनोरम हो मुखर
ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको
झर-झराते नीर बहना थाम लो
आज दिन है खास जिसका।
इस घडी तुम साथ रहलो
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
उम्र की दहलीज पर जब होंगे खड़े
उम्र की दहलीज पर जब होंगे खड़े
कल सुबह फिर इस तरह उल्लास लाना।
चल चलें उस पार से यादें समेटें
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं
है यही शुभकामना कि ईश का आशीष हो
शीश पर हरदम 'श्री माँ का' मृदुल आँचल रहे

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