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Friday, 30 September 2016

स्वप्न बुलाता हूँ


स्वप्न कब किसके हुए, सब जानते हैं
आज मैं सारे जतन कर सो रहा हूँ
कल सपन के गीत का आरोह मैं था
वे भरेंगे रागिनी इस यामिनी में
बाँध लूँगा किंकिणी उन मृदु करों में
तार मैं अपने हृदय के कस रहा हूँ।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

















टाँक तारे लाएगी चूनर सजीली यामिनी
साथ होगी संगतें भी झुनझुनाते झींगुरों की
दूर बजती थालियाँ संकेत देगी मोद की
थाप की थिरकन भरी पिघली शिराएँ
झूमती उन्मादिनी लिपटी लताएँ
साथ होंगी हूँक भी वन कुंजरों की।।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

जब सजेगी यामिनी भी, रागिनी भी
जब बजेगी दुन्दुभी मन मोदनी भी
जब सितारे रोशनी मद्धिम बिखेरें
तब नगर होगा सभी से बेखबर
स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।


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