जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
ईश का आशीष है जब
अनवरत आधार बनता
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण चलता।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
प्रार्थना का मूल प्रभु की
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
चक्र रुकता कब समय का।।
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
ईश का आशीष है जब
अनवरत आधार बनता
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण चलता।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।
प्रार्थना का मूल प्रभु की
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है।।
जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

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