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Friday, 15 December 2017

डायरी

जीवन की डायरी के वे सफ़े
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है

कलम वो भी थी
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ

यहाँ छन्द, बन्द,
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
चहक उठी तरुणाई है
रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन