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Sunday, 3 December 2017

फिर नई होगी सुबह

 फिर नई होगी सुबह

फिर नई होगी सुबह
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे

शेष है बस दिवस तीन
फिर नई होगी सुबह
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर

फिर नई होगी सुबह
माँ लिये आशीष के वर
अनवरत आधार बनती
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण बसती

फिर नई होगी सुबह
प्रार्थना के मूल में माँ
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन