*

*
*

Wednesday, 13 November 2019

लौटा जीवन में फिर बसन्त

उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।

कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन