बरस कर प्यार बन हर दिन
मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
समा कर क्यों धड़कते हो।।
ऋणी हूँ उन हवाओं का
तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
मुझे जो थपथपाती है

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