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Wednesday, 13 November 2019

मन क्यों भिगोते हो

बरस कर प्यार बन हर दिन
  मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
  अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
  यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
  समा कर क्यों धड़कते हो।।

ऋणी हूँ उन हवाओं का
  तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
  प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
  हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
  मुझे जो थपथपाती है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन