जब तुम न थी
तुम न थी तो रश्मियों में उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में प्रीत का मधुमास ना था।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी रज बिना मधुभार से थे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी चहुँ दिशा अदिधवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे अधर शहदी मधुप के गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे कोकिला ये छ्न्द गाती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
तुम मिली अँकुवा गये नव कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ झूलती साँझे सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम हो प्रीत के पाहुन पधारे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
रामनारायण सोनी
११.१२.२०

No comments:
Post a Comment