*

*
*

Tuesday, 29 December 2020

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ

रागिनी से सिक्त है इन 

शब्द में ये अर्चनाएँ।

प्राण की वंशी निनादित 

हैं गमकती व्यंजनाएँ

पुष्प की सौरभ लिये 

गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।


रात जागी कामिनी के 

कुन्द होते करतलों में

कुनमुनी नलिनी अलापे 

प्रीत के मधुरिम पलों में।

रंग रांची है महावर 

नव उदित है कोंपलों में

फिर रुहानी सी कहानी 

कह रही इन शतदलों में।।


No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन