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Monday, 19 June 2017

मैं जला हूँ दीप बन कर

   *मैं जला हूँ दीप बन कर*
मैं तमिस्रा में जला हूँ दीप बन कर
तैल की इक बूँद भी ना शेष होगी।
गंध बुझती बातियों की जब लगे
प्रिय तुम्हारी प्रीत ही अवशेष होगी।।

अंक में ज्वाला समेटे उम्र भर से
जो तिरोहित हो रही नित रश्मियाँ।
पन्थ में तेरे बिछी है आस बन कर
प्रस्तरों के भार सहती संधियाँ।।

सांझ से ही चिर प्रतीक्षा जागती है
हर निशा ही व्यंजना लेकर खड़ी है।
भोर तक है साध में यह लौ अकंपित
भग्न अधरों पर पिपासा हर घड़ी है।।

प्राण में हर पल निरे निःश्वास ही है
जिन्दगी कण-कण तिमिर में घुल रही।
बंधनाएँ वर्जना बस प्राण की है
थाम कर इन धड़कनों को चल रहीं।।

Sunday, 18 June 2017

कविता ने जगा दिया

बड़े सवेरे आज मेरी कविता ने मुझे जगा दिया
तंद्रा टूट न पाई थी कुछ कानों में बुदबुदा दिया
रोज मुझे तुम ले जाते हो अपनी टर्र सुनाते हो
चाहो बस वह कहती हूँ मैं आज तुम्हें ले जाऊँगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने अम्बर पट पर ऊषा का अरुणिम देखा है
पंछी के कलरव सुने अभी यह मंगल तुमने देखा है
तपती धरती पर नंगे पग जीवन के रिसते वे छाले
ढली सांझ भूखे लौटे उन बच्चों से मिलवाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुम रहे डोलते मस्ती में मस्तों की अल्हड़ टोली में
रसवन्ती रसना में डूबे रसिकों की रसमय बोली में
उन सूखे कंठों, अधरों में करती नृत्य पिपासा में
बच्चों बूढ़ों की आशा के मरघट तुम्हें दिखाऊँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

घोड़ों संग दौड़ रही दौलत दाँवों पर दाँव लगे देखे
अंकों की मंडी शाम सुबह वे खुल कर बंद हुए देखे
पर पल पल चूते जीवन की गागर में जहँ दर्द भरे
उन आहों और कराहों का परिचय तुम्हें कराऊंगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने छ्त से लटके रोशन फानूस कई देखे होंगे
उनसे रोशन रिश्तों के हमराज कई देखे होंगे
गुमनाम अंधेरी गलियों में वे चीख रहे हैं सन्नाटे
टिम टिम करता मिट्टी का दीपक तुमको दिखलाउँगी।

   अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

Tuesday, 13 June 2017

आतंकवाद

कौन है जो इन युवाओं में पलीते धर रहा
छीन कर पुरुषार्थ उनमें विप्लवों को बो रहा।
उन जड़ों की ठीक से पहिचान करनी चाहिए
क्यारियाँ केशर की उजड़ी नागफनियाँ धर रहा।।

वक्त है आह्वान का तुम शक्ति का संधान कर लो
अब कसो तूणीर उनमें रण विजय के तीर धर लो।
है धरा के ऋण चुकाने का समय अभिनव खड़ा
धार में अपने परशु को तीक्ष्ण करके आग भर लो।।

जो उठी है विष भरी संभावनाएँ अरिदलों में
शांति के उड़ते कपोतों को लहू से रंग रहे।
नष्ट कर दो ताकतों को जो अनर्गल हो रही
वे नहीं मानव जगत में हिंस्र कितने हो रहे।।

Friday, 9 June 2017

बंधना

मैं हूँ प्यारी सोन चिरैया
धरती के आँगन मैं खेली
बचपन मेरा विभव भरा
यौवन की दहलीज रुपहली

बंधी व्याध की पाश प्रबल मेरी आशाएँ
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

मैं थी अपना एक गगन था
उम्मीदों में संग पवन था
मेरा मन अपने ही जग में
अपने ही उल्लास मगन था

काल निशा बन जीवन में गहराए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

तिनका तिनका चुन कर मैंने
नन्हा सा था नीड़ बनाया
नीचे बगिया महक रही थी
चंचरीक था संग संग गाया

दावानल मुट्ठी में भर भर क्यों लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जुड़ कर टूटी, जुड़ी टूट कर
भीषण संघर्षों की वीथी में
पैर जमाए खड़ी रही हूँ
झंझा के अंधे कलरव में

जीवन-सागर में क्यों सुनामी लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

पंख बँधे हैं फिर भी मेरे
हाथों में पुरुषार्थ भरा है
मेरी चिचियाहट में अब भी
शब्दों का एक कोष भरा है

संकल्पों के कल्प मेरे गिनने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जिस पल बन्द खुलेंगे मेरे
फिर से होगा गगन मेरा
उफनेगा उल्लास सिंधु का
नाचेगा मन मोद भरा

अपने कर्म बीज मुझे गिनाने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

आज उषा में नवप्रभात है
खण्ड खण्ड वे दम्भ पड़े हैं
पगडण्डी के पथ वे सारे
राजपथों से आज जुड़े हैं

देख उन्हें ही शायद इतने चुँधियाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

संग तुम्हारा,

कलाम भले ही हमारा हो
पर कमाल तो तुम्हारा है
कलम भले ही हमारी है
इसमें शबाब तो तुम्हारा है

दीप-बाती भले ही हमारी हो
रोशनी इसमें कहाँ हमारी है
ह्रदय हमारा भले ही हो पर
इसमें धड़कने सब तुम्हारी हैं

कभी कभी यह सोचता हूँ
मैं तो निकला था फकीरी में
न शब्द थे, न भाव, झोली में

अब लगता है मैं हूँ अमीरों में
पता नहीं चलता कि कब तुम
रोज खीसे में कुछ डाल देते हो
अपनी जेब में सिक्के आपके ही हैं

रामनारायण सोनी

र्मै फिर भी जी गई


प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।

पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।

तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।



Sunday, 4 June 2017

क्रन्दन ही क्रन्दन था





माथे की हर एक सिलवट में
पीड़ा के अम्बार भरे हैं
इनमें जो इतिहास लिखे वे
कालिख के प्रतिमान धरे हैं


धुँधियाती बुझती आखें हैं
इनमें अगणित प्रश्न भरे हैं
खामोशी कितनी है फिर भी
सागर जैसे शोर धरे हैं


गहराती जीवन संध्या में
बाकी बस क्रन्दन ही क्रन्दन
तन से बोझिल अब हैं साँसे
छालों से यह विगलित है मन


उठे याचना के हाथों में
मृत्यु माँगती है या जीवन
टूट गई अब वे आशाएँ
पीड़ा में जलता है तन- मन

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