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Sunday, 18 June 2017

कविता ने जगा दिया

बड़े सवेरे आज मेरी कविता ने मुझे जगा दिया
तंद्रा टूट न पाई थी कुछ कानों में बुदबुदा दिया
रोज मुझे तुम ले जाते हो अपनी टर्र सुनाते हो
चाहो बस वह कहती हूँ मैं आज तुम्हें ले जाऊँगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने अम्बर पट पर ऊषा का अरुणिम देखा है
पंछी के कलरव सुने अभी यह मंगल तुमने देखा है
तपती धरती पर नंगे पग जीवन के रिसते वे छाले
ढली सांझ भूखे लौटे उन बच्चों से मिलवाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुम रहे डोलते मस्ती में मस्तों की अल्हड़ टोली में
रसवन्ती रसना में डूबे रसिकों की रसमय बोली में
उन सूखे कंठों, अधरों में करती नृत्य पिपासा में
बच्चों बूढ़ों की आशा के मरघट तुम्हें दिखाऊँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

घोड़ों संग दौड़ रही दौलत दाँवों पर दाँव लगे देखे
अंकों की मंडी शाम सुबह वे खुल कर बंद हुए देखे
पर पल पल चूते जीवन की गागर में जहँ दर्द भरे
उन आहों और कराहों का परिचय तुम्हें कराऊंगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने छ्त से लटके रोशन फानूस कई देखे होंगे
उनसे रोशन रिश्तों के हमराज कई देखे होंगे
गुमनाम अंधेरी गलियों में वे चीख रहे हैं सन्नाटे
टिम टिम करता मिट्टी का दीपक तुमको दिखलाउँगी।

   अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

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