*

*
*

Friday, 9 June 2017

संग तुम्हारा,

कलाम भले ही हमारा हो
पर कमाल तो तुम्हारा है
कलम भले ही हमारी है
इसमें शबाब तो तुम्हारा है

दीप-बाती भले ही हमारी हो
रोशनी इसमें कहाँ हमारी है
ह्रदय हमारा भले ही हो पर
इसमें धड़कने सब तुम्हारी हैं

कभी कभी यह सोचता हूँ
मैं तो निकला था फकीरी में
न शब्द थे, न भाव, झोली में

अब लगता है मैं हूँ अमीरों में
पता नहीं चलता कि कब तुम
रोज खीसे में कुछ डाल देते हो
अपनी जेब में सिक्के आपके ही हैं

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन