माथे की हर एक सिलवट में
पीड़ा के अम्बार भरे हैं
इनमें जो इतिहास लिखे वे
कालिख के प्रतिमान धरे हैं
धुँधियाती बुझती आखें हैं
इनमें अगणित प्रश्न भरे हैं
खामोशी कितनी है फिर भी
सागर जैसे शोर धरे हैं
गहराती जीवन संध्या में
बाकी बस क्रन्दन ही क्रन्दन
तन से बोझिल अब हैं साँसे
छालों से यह विगलित है मन
उठे याचना के हाथों में
मृत्यु माँगती है या जीवन
टूट गई अब वे आशाएँ
पीड़ा में जलता है तन- मन


No comments:
Post a Comment