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Sunday, 4 June 2017

क्रन्दन ही क्रन्दन था





माथे की हर एक सिलवट में
पीड़ा के अम्बार भरे हैं
इनमें जो इतिहास लिखे वे
कालिख के प्रतिमान धरे हैं


धुँधियाती बुझती आखें हैं
इनमें अगणित प्रश्न भरे हैं
खामोशी कितनी है फिर भी
सागर जैसे शोर धरे हैं


गहराती जीवन संध्या में
बाकी बस क्रन्दन ही क्रन्दन
तन से बोझिल अब हैं साँसे
छालों से यह विगलित है मन


उठे याचना के हाथों में
मृत्यु माँगती है या जीवन
टूट गई अब वे आशाएँ
पीड़ा में जलता है तन- मन

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन