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Wednesday, 4 October 2017

तुम ही तो हो

नज़्म
*तुम ही तो हो*
ढूँढने निकला था जिसे सेहरा में
खिली थी गुलशन हो कर
सुनहरी रोशनी बन
ढलती हुई उस शाम 
बादलों के बदन पे
फिर उतरी जो जहन में 
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

जमीं की नर्म रेशमी सिलवटें
गुदगुदाती पगथली मेरी
ओढ़े पड़ी दरख्तों के साये
तपती रहीं जो दिन भर
सहलाती रही पोर पोर
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

धुँधलके गहरा गए 
तबदील हुए घुप्प चादर में
ओढ़ कर जिन्हें
रात भर बैठा रहा 
पूरे इतमिनान से
मिटा दी तन बदन की
थकन की पीर को
मैं समझ नहीं पाया
कि वो तुम  ही तो हो।।


Tuesday, 12 September 2017

कुछ कहो ना

आओ.लिख डालें कुछ ऐसा
  स्याही सूखने के पहले
बाँट लें कुछ पल ऐसे
  हाथ के थमने से पहले।।

अभी है गुल भी गुलशन भी
  अंजुरी भर सुरभि पी लें
जला लें दीप नेहिले से
  तमी छाने के कुछ पहले।।

Saturday, 9 September 2017

बैसाखियाँ


शूल बन कर फूल भी चुभते रहे
अर्थ बिन जो शब्द थे मथते रहे
रश्मियाँ बन उर्मियाँ दलती रही
वे कनक घट विष भरे झरते रहे।।

इन कुहासों में घिरी अतिरंजनाएँ
है सिमटता मुट्ठियों में आसमां भी
हम बिखरते स्वप्न के अंबार में
चाहतों की ही किरच चुनते रहे।।

जिन्दगी बैसाखियों पर चल रही
चू गई संकल्पनाएँ क्षार बन कर
कोंपलें अर्पित हुई पतझार को
हम पिपासा ही लिये चलते रहे।।

Thursday, 7 September 2017

Dictionary

मैं हर रोज सोचता रहता हूँ...

The whole dictionary is a set of 26 letters and a few symbols but by arranging them it becomes a big volume.

A volume of set of expression, emotion, regulation , creations and, of course, emergency life events.

Even if, 25 letters can't complete a bible.

If you withdraw a single letter from your motivational and emotional  thoughts,
my work will be no where.

इसलिए तो

मेरी कृतियों से तुम निकल गए
तो उन २५-२६ अक्षरों को कौन पढ़ेगा।
तुम्हें अपने आपको देखना हो
तो मेरी रचनाओं में घूम कर चले जाना
यहाँ तुम ही तुम हो

Ramnarayan Soni.

आराधन

है आज शक्ति का आराधन
अपने शुभ संकल्प सबल होवें
ऊर्जा के कण कण मन मे
जीवन में सत्य प्रबल होवे
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।

यह समय की रेख है
काल मेघ घिर चले
पवि-प्रहार साक्ष्य हैं
दर्पणों के टूटने से पहले
स्वयं को निहार लो।
प्रचण्ड वेग वायु है
इस धरा की धूम से
अस्मिता सँवार लो।।


Thursday, 27 July 2017

सम्मान

सम्मान व्यक्ति का नहीं
विभूति का है, कृतित्व का है,
आराधन का है, आह्वान का है 
सिद्धि का है, साधना का है
धर्म का है, धृति का है

श्रम का है, समर्पण का है
मील के उन पत्थरों का है
जो पुरुषार्थ के फूटप्रिन्ट है
उन उपादानों, उद्यानों का है
जो जगत को सुगन्धित करते है

याद रहे! साधना अनन्त है
अतीत एक सुन्दर दर्पण है,
पर दर्प तुम्हें न हो जाए
भगीरथ कहीं ठहर न जाए
खुद अवतर की गई गंगा
उसे बहा न ले जाए

मंथन में पहले हलाहल है,
श्री के उपरान्त ही अमृत है
डर न जाएँ, बिखर न जाए
कहीं यह बात बिसर न जाए
रामनारायण सोनी

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