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Sunday, 17 June 2018

बूँद बूँद चू गया

लगता है मेरे प्रेम-घट में
कोई सुराख सा हो गया
सहेजा जिन्दगी भर से
बूँद बूँद कर ही चू गया

मेरी यह प्रीत की दुल्हन
बस झाँकती है अतीत में
जाने कौन घड़ी याद का
सर से दामन सरक गया

अब तो बारिशें खुद ही
उड़ा ले जाती रिमझिम को
वो चाँद भी रोशनी कम
जलन की बौछार कर गया

गुनाह मेरा, मेरे दिल का है
नशा है इश्किया इसका
नहीं पतवार कश्ती में ये
तूफाँ पर भरोसा कर गया

ये कौन सक्ष है..

ये कौन सक्ष है.. 
जो किसी दुखिया के
आँसू से पसीज गया
ये कौन सक्ष है...
गरीब की झोंपड़ी से
दर्द उधार ले गया।
ये कौन सक्ष है...
जो तुम्हारे बुखार से
इतना तप गया
ये सक्ष कौन है...
जो तुम्हारे पग में लगे
काँटों से बिंध गया।
कौन है जो भिखारी के
तन मन में बैठ गया है
जगत की संवेदनाओं का
व्यवहार करता है
कौन है वह जो पढ़ लेता है
एक बूढ़े के चेहरे की
सिलवटों में से अमुभव के छ्न्द
लोग यही समझते हैं
पागल, आवारा, दीवाना, फुर्सती है
शरारती, अक्खड़ लोगों ने
और भी कई उपाधियाँ खोज ली होंगी
पर वह सक्ष दीनों का हमदर्द है
रंगकर्मी है, लेखक है या कवि है

संत भय्यू जी महाराज

जिन्दगी के अजब रंग है
रोशनी ले कर चला वह
पर छाया संग थी
न जान सके वे

सफर में अकेले नहीं
दुखियारे, पतित, असहाय संग थे
यह आधी दुनिया की जीत अधूरी

जंग एक बाहर थी जीत ली
जंग थी एक भीतर से
वह पुरोधा,
बाहर महारथियाँ से लड़ता रहा
पर हार गया
भीतर के पिद्दलों से

बाहर शबाब ही शबाब
भीतर कोलाहल और विक्षेप
संतुलन की अवधारणा
क्यों हुई ध्वस्त
यथार्थ उस कालजयी का
बाहर से कभी नहीं
हा! हार गया भीतर ही से

*इसलिये गीता कहती हैं*

अभ्यास करो उस समन्वय योग का।

*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2/38।।*

जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

रामानारायण सोनी

Saturday, 16 June 2018

छबि तुम्हारी

मैं गिरि का पाहन हूँ
  तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
  तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे
  तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
  तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा
  पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
  सजती वो छबि तब तब।।

रामनारायण सोनी

Thursday, 14 June 2018

याद का सन्दूक

कमी जरूर मुझ में ही होगी कहीं
कि
तुम्हारी याद के सन्दूक से
कपूर की तरह उड़ गया,

क़तरा क़तरा बिखर गया
बिखर बिखर मैं,
देखता रहता हूँ
बस तुम्हें ही

पगडंडियों का राहगीर

लहरिया पगडंडियों का राहगिर हूँ
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

झेलती झंझा उदधि की हूँ मैं लहर
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

छ्त मेरी नित नील तारक से मढ़ी है
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

प्रिय आत्मन्

Come
Come my dear!

Come aloof
With mind and the Soul

Rejoice within selfness
Let us listen
The holy song
The song of silence
Of that ocean of Peace

आओ!
आओ मेरे प्रिय आत्मन्!

आओ अकेले ही
मन अौर आत्मा के सहित

स्वयं का आनन्द प्राप्त करें
हम सुनें
वह पवित्र गीत
गीत निस्तब्धता का
उस शान्ति के सागर का

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