मैं गिरि का पाहन हूँ
तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
तू छंदों का मधुर बंध।।
क्रन्दन के गाँव मेरे
तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
तुम सप्तक शुभ वंशी के।।
मैं दर्पण हूँ कोरा सा
पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
सजती वो छबि तब तब।।
रामनारायण सोनी
तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
तू छंदों का मधुर बंध।।
क्रन्दन के गाँव मेरे
तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
तुम सप्तक शुभ वंशी के।।
मैं दर्पण हूँ कोरा सा
पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
सजती वो छबि तब तब।।
रामनारायण सोनी

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