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Saturday, 16 June 2018

छबि तुम्हारी

मैं गिरि का पाहन हूँ
  तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
  तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे
  तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
  तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा
  पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
  सजती वो छबि तब तब।।

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन