भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
कमी जरूर मुझ में ही होगी कहीं कि तुम्हारी याद के सन्दूक से कपूर की तरह उड़ गया,
क़तरा क़तरा बिखर गया बिखर बिखर मैं, देखता रहता हूँ बस तुम्हें ही
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