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Wednesday, 10 October 2018

एकलव्य और द्रोण

सुनो!
गुरू द्रोण!!
मान्यता, श्रद्धा,
साधना, समर्पण
और भाव-भूमि पर,
एकलव्य का अंगूठा
गाण्डीव  पर भारी है
जो तुमने दिया ही नही
प्रतिकार उसका माँगा?
कैसे न्यायकारी हो
गुरुता पर लघुता
कितनी भारी है
अंततोगत्वा
इसीलिए छलना हारी है।

पर्व पर्यूषण

जो औरों क्षमा नहीं करता
वह क्षमा कदापि नहीं माँग सकता

क्षमा है भूषण वीरों का
क्षमा माँगना आभूषण है

क्षमा माँगना हार नही है
सोपान है यह आत्मशोधन का

कोई याचना नही है क्षमा
क्षमा स्वयं ही तप है

तपता है जब स्वर्ण
छोड़ देता है अन्तर्निहित मैल

वन मे तपता है वृक्ष
झाड़ देता है पुराने जर्द पत्ते

सागर जब तपता है
देता है जन्म पर्जन्य को

तपता है जब सूरज
देता है जीवन जगत को

तपता है सन्त
सुकून देता है समाज को

सिर्फ आयोजन नहीं है पर्यूषण
यह एक पावन पर्व है

प्रेम का, सौहार्द्र का, रिश्तों का,
सद्व्यवहार पर लगी गर्द हटाने का
उन पर नूतन रंग चढ़ाने का

कुन्दन बनेगी ज़िंदगी

शुक्र है ये कि
इस कड़कती दुपहरी में,
मेरा साया मेरे कदमों तले है

छाँव होती अगर 
तो  लील जाता मुझे ही
यह तपिश
कोई साजिश नहीं
कुन्दन बनाती  है 
ज़िन्दगी को

जीतूँगा डूब कर

वास्कोडीगामा
साहसी है कि हम!
लेकर कागज़ की नाव
न कुतमनुमा, न पतवार
उतर पड़े हम
असीम प्रेम सागर में

तरना किसे है!
जीतेंगे डूब कर

मुझे मुझ से मिला दो

तुमसे बात नही होती..
मन ही नहीं करता
और किसी से बात करने का

ढूँढते-ढूँढते तुम्हें
थक कर स्वयं में जब
लौटना चाहता हूँ
तो स्वयं भी खो जाता हूँ

न मिल सको तो कम से कम
मुझ से मुझे मिला दो

पीड़ा का सुख

मेरी सुख-बोध की
गर्द जमी आख्यायिकाएँ
नहीं पढ़ता कोई,
अब मैं भी नहीं
चौथी बार सुने
उसी चुटकुले की तरह
उबाऊ हो गई हैं वे

समय के वक्ष पर
सिक्त पड़े वृण
छूते ही हरियाते हैं
रोकूँ तो रिस जाते हैं
कुकुरमुत्ते की तरह
भाते हैं जाने क्यों
उन्हें भी, मुझे भी
अजीब है मन भी
ढूँढता है पीड़ा में
फिर पीड़ा का सुख

रामनारायण सोनी




Monday, 8 October 2018

पीर ही साजन हो गई

पीर ही साजन हो गई
मैंने नृत्य करना छोड़ा नहीं
  तुमने अपनी वंशी को
     विराम दे दिया है
मेरे कान बहरे नहीं हुए
  तुम्हारी पदचाप ही
     ठहर गई हैं कहीं
आँखें अभी पाथर नहीं हुई
  पर देखो रास्ते खुद
     रास्ता देख रहे हैं
मेरी कविता मरी नहीं अभी
   स्मृतियों के अमर कोष के
     वेन्टीलेटर पर जी रही हैं
कौन सुनेगा मेरी
  एक हाथ की ताली
    बावरी मीरा नेपथ्य से बोली....
     जो मैं ऐसा जानती,
        प्रीत किये दुःख होय...
पीर ही साजन हो गई
    मेरी प्रीत सुहागन हो गई

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