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Wednesday, 10 October 2018

एकलव्य और द्रोण

सुनो!
गुरू द्रोण!!
मान्यता, श्रद्धा,
साधना, समर्पण
और भाव-भूमि पर,
एकलव्य का अंगूठा
गाण्डीव  पर भारी है
जो तुमने दिया ही नही
प्रतिकार उसका माँगा?
कैसे न्यायकारी हो
गुरुता पर लघुता
कितनी भारी है
अंततोगत्वा
इसीलिए छलना हारी है।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन