जो औरों क्षमा नहीं करता
वह क्षमा कदापि नहीं माँग सकता
क्षमा है भूषण वीरों का
क्षमा माँगना आभूषण है
क्षमा माँगना हार नही है
सोपान है यह आत्मशोधन का
कोई याचना नही है क्षमा
क्षमा स्वयं ही तप है
तपता है जब स्वर्ण
छोड़ देता है अन्तर्निहित मैल
वन मे तपता है वृक्ष
झाड़ देता है पुराने जर्द पत्ते
सागर जब तपता है
देता है जन्म पर्जन्य को
तपता है जब सूरज
देता है जीवन जगत को
तपता है सन्त
सुकून देता है समाज को
सिर्फ आयोजन नहीं है पर्यूषण
यह एक पावन पर्व है
प्रेम का, सौहार्द्र का, रिश्तों का,
सद्व्यवहार पर लगी गर्द हटाने का
उन पर नूतन रंग चढ़ाने का

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