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Wednesday, 10 October 2018

पर्व पर्यूषण

जो औरों क्षमा नहीं करता
वह क्षमा कदापि नहीं माँग सकता

क्षमा है भूषण वीरों का
क्षमा माँगना आभूषण है

क्षमा माँगना हार नही है
सोपान है यह आत्मशोधन का

कोई याचना नही है क्षमा
क्षमा स्वयं ही तप है

तपता है जब स्वर्ण
छोड़ देता है अन्तर्निहित मैल

वन मे तपता है वृक्ष
झाड़ देता है पुराने जर्द पत्ते

सागर जब तपता है
देता है जन्म पर्जन्य को

तपता है जब सूरज
देता है जीवन जगत को

तपता है सन्त
सुकून देता है समाज को

सिर्फ आयोजन नहीं है पर्यूषण
यह एक पावन पर्व है

प्रेम का, सौहार्द्र का, रिश्तों का,
सद्व्यवहार पर लगी गर्द हटाने का
उन पर नूतन रंग चढ़ाने का

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन