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Monday, 8 October 2018

पीर ही साजन हो गई

पीर ही साजन हो गई
मैंने नृत्य करना छोड़ा नहीं
  तुमने अपनी वंशी को
     विराम दे दिया है
मेरे कान बहरे नहीं हुए
  तुम्हारी पदचाप ही
     ठहर गई हैं कहीं
आँखें अभी पाथर नहीं हुई
  पर देखो रास्ते खुद
     रास्ता देख रहे हैं
मेरी कविता मरी नहीं अभी
   स्मृतियों के अमर कोष के
     वेन्टीलेटर पर जी रही हैं
कौन सुनेगा मेरी
  एक हाथ की ताली
    बावरी मीरा नेपथ्य से बोली....
     जो मैं ऐसा जानती,
        प्रीत किये दुःख होय...
पीर ही साजन हो गई
    मेरी प्रीत सुहागन हो गई

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन