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Friday, 31 May 2019

गीत अधरों पर बुनो

आज कोकिल कोकिला संग स्वर मिलाती
साज संगत के कहीं रख सुनो तुम भी सुनो
आम्र कुञ्जों में सजा एकल मुखर रव ही
ओ रागिनी के सप्त स्वर गुनो तुम भी गुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

साँस साधे क्यों खड़े तुम पथिक पाथेय बन
मंजरी के, भ्रमर के संग नवगीत तुम बुनो
गुलमोहर की रक्तिमा भी लाजवन्ती लग रही
स्वर्ण चम्पा केतकी ओ! प्रीत के पाहुन चुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

रामनारायण सोनी

(३१*५*१९)

Wednesday, 29 May 2019

यह नदी अभिशप्त सी है

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
जान हो यह सुप्त सी है।

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

Thursday, 9 May 2019

मनुज की भूख


भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।

वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं

भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है

शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही

Friday, 26 April 2019

मेरी वसीयत

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
शर्म हया की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद बहुत दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ मेरा, बिना मोल के बिक जाएँगे।।

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
अपने ये नयन तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो अजीज कितने मेरे जान तभी पाओगे।।

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
मेरा मुझ पर नही शेष अब
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।

Sunday, 7 April 2019

याद का सन्दूक

कमी जरूर होगी कहीं
कि...
तुम्हारी याद के सन्दूक से
कपूर की तरह उड़ गया,

कतरा कतरा बिखर गया
बिखर बिखर मैं
देखता ही रहता हूँ
बस तुम्हे ही

Thursday, 4 April 2019

रूही

कैसे कह दूँ अलग हो तुम
इस रूह की तलब हो तुम
बात रूबरू मिलने की थी
मुझ में घुल ही गये हो तुम

Tuesday, 4 December 2018

जिद अपनी अपनी

मेरा जन्म हुआ
सिर्फ उजालों के खातिर
मैं दिया हूं,
मैं बस देता ही देता हूँ
तब तक,
जब तक खाली न हो जाऊँ
हवाएँ तो
व्यर्थ दुश्मनी में लगी है
ये शायद
बुझा कर भी बन्द न होगी
जिद है बस
उसकी अपनी, मेरी अपनी

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