मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
अल्फाजों से नही
अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
क्योंकि तुम
बिना अलफ़ाजों के भी
सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
कितना बोलते हैं
है ना?
रामनारायण सोनी
३०.११.२०
मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
अल्फाजों से नही
अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
क्योंकि तुम
बिना अलफ़ाजों के भी
सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
कितना बोलते हैं
है ना?
रामनारायण सोनी
३०.११.२०
तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त
मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास
भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज
स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख
रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है
रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४
कोई तो भगीरथ है
जो उतार लाया
गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
न ही भगीरथ
कौन है वो
जो कर गया यह सब
बस एक अहसास है मुझे
बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
कितना सुन्दर है
कृपा का वर्षण है
तुम-हम बस भींगते रहें
रामनारायण सोनी
३०.११.२०२०