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Sunday, 6 December 2020

सुनो चुपचाप

मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
  अल्फाजों से नही
    अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
  क्योंकि तुम
   बिना अलफ़ाजों के भी
    सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
  कितना बोलते हैं
   है ना?

रामनारायण सोनी
३०.११.२०

तुम प्रिय प्रवास

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४

Saturday, 28 November 2020

करता तो तू है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

रामनारायण सोनी
३०.११.२०२०

Monday, 23 March 2020

न मैं रहूँ न मेरा कुछ

तू पानी है 
हल्दी हूँ मैं
घुल कर तुझमें 
खो कर खुद ही
बस रंग छोड़ जाऊँगी

तू हथेली है
हिना हूँ मैं
रच कर तुझमें
लकीरों की छाँह में
बस छुप कर रह जाऊँगी

करुणा सागर तू
नन्ही इक बूँद मैं
डूब कर सागर में
न मैं रहूँ न मेरा कुछ 
बस पानी रह जाऊँगी

रामनारायण सोनी



Friday, 14 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Friday, 7 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Monday, 3 February 2020

गीत बसन्ती

गीत बसन्ती 

आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

चम्पा चमेली ने है माँडी रंगोली, 
अँबुवे की डाली पे कोयल बोली,
पपिहे ने कानों में मिसरी है घोली,
टेसू-जुही मिल के करत ठिठोली,
महुए पे छाया खुमार, समीरन चंवर डुले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रागों ने छन्दों से रास रचाया,
फागों ने खुशबू का कीच मचाया,
शब्दों ने भावों का उबटन लगाया,
साजों-सुरों ने है अलख जगाया,
गीतों ने ओढ़ा सिंगार, रसिया आन मिले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रामनारायण सोनी
०४/०१/२०२०

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