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Tuesday, 29 December 2020

पतझड़ फिर जीत गया

*पतझड़ फिर जीत गया*

पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया

चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।

रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ

रागिनी से सिक्त है इन 

शब्द में ये अर्चनाएँ।

प्राण की वंशी निनादित 

हैं गमकती व्यंजनाएँ

पुष्प की सौरभ लिये 

गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।


रात जागी कामिनी के 

कुन्द होते करतलों में

कुनमुनी नलिनी अलापे 

प्रीत के मधुरिम पलों में।

रंग रांची है महावर 

नव उदित है कोंपलों में

फिर रुहानी सी कहानी 

कह रही इन शतदलों में।।


Sunday, 20 December 2020

नेह धरा पर उतरें

नेह धरा पर ऐसे उतरें

गीत गगन के गाऊँ मै, तुम गाओ मेघ मल्हार
प्रीत का पावन पावस ले हम नेह धरा पर उतरें।
मेघ बचे न बचे गगन न बोल बचे न बचे अगन
बूँद बनें हम एकल होवें नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

मन में मन को ऐसे घोलें जैसे जल में मिसरी
भावों के मीठे पानी से भरी रहे मानस की गगरी।
अरुणिम आभा लेकर ऊषा अपने आँगन उतरी
तेरी मेरी व्यथा-कथा अब तन से मन से बिसरी।।
                 हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

पवन बसन्ती बनो लहरिया फूले इस उपवन में
मैं पराग शतदल का हो कर संग उडूँ कानन में।
जगती को मिल कर महकाएँ उतरें जन गण मन में
अलग अलग रह हो न सकेगा पड़े नहीं भटकन में।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

रामनारायण सोनी
१६.१२.२०२०

Thursday, 10 December 2020

जब तुम न थी

जब तुम न थी

तुम न थी तो रश्मियों में उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी चहुँ दिशा अदिधवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी मधुप के गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ झूलती साँझे सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम हो प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

Sunday, 6 December 2020

सुनो चुपचाप

मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
  अल्फाजों से नही
    अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
  क्योंकि तुम
   बिना अलफ़ाजों के भी
    सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
  कितना बोलते हैं
   है ना?

रामनारायण सोनी
३०.११.२०

तुम प्रिय प्रवास

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४

Saturday, 28 November 2020

करता तो तू है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

रामनारायण सोनी
३०.११.२०२०

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