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Friday, 1 January 2021
*आदमी का शोर है*
२ कविताएँ
एक ही तो है
एक ही तो है
नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ
मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम
रामनारायण सोनी
३.११.२०
कोरोना से डरो ना
सिक्के के दो पहलू
एक पहलू
अभी जीवन कहीं दुबक गया है
करोना दानव कालमेघ बन
धरती पर उतर गया है,
क्या यह डर है कि..
सागर अपने तटों को लाँघ कर
बस्तियाँ न उजाड़ दे,
अमावस की काली रात में
तारे हम पर न आ गिरें,
बिजली तारों को छोड़
सड़क पर न बहने लगे,
कहीं से नदियाँ मुड़ कर न आ जाए
बहा ले जाएँ घर को अपने
क्या यह डर है कि..
कोरोना वायरस धरती को
जीव रहित न कर दे?
रुको! यह खाली पीली
डर का कल्पित डर है
बस, रहना केवल अपने घर है
दूसरा पहलू
आज शहर से गाँव सुखी हैं
लोग इसीलिये घर को दौड़े हैं
जहाँ दिलों की सिकुड़ी बस्ती
पाँव पड़े अनगिन फोड़े हैं
बन्द पड़ी है गेंगवार, रेप, लूट
अपराधों की भारी गचपच
टी. वी. पर से नेता गायब
थोथे वादों की ना भचभच
कोयल कूक रही आँगन में
पादप पल्लव स्वच्छ धरे हैं
संध्या से अरुणिम ऊषा तक
तारे टिम टिम प्रखर भरे हैं।
गंगा जमना के मिस फूँके अरबों
पर ऐसी निर्मल कब थी माँ गंगे
प्रकृति ने बोला यह मंत्र स्वयं ही
"नमामि यमुने" और "नमामि गंगे"
रामनारायण सोनी
25.05.20
भाव लिखे थे
चुप की आवाजें
मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
अल्फाजों से नही
अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
क्योंकि तुम
बिना अलफ़ाजों के भी
सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
कितना बोलते हैं
है ना?
रामनारायण सोनी
३०.११.२०
मौन क्या क्या कह रहा
मौन कितना बोलता तू सुन कभी
सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।
मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।
मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।
प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती
मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।
कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।
रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन