समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी
मेघों कोई संदेश क्या लाया
कि उम्मीदें दौड़ पड़ी
आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
कि आहटें दस्तक दे गई
मन के नगर की अट्टालिकाएँ
आतुर हैं दीदार को
मैं जानता हूँ
कि वह तुम ही तो हो!
हाँ, तुम ही!!
🌹मैं
दिशाएँ बोलती क्यों है?
वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ
फिर फिर
दी थी मैंने
जो दिशाओं को
गूँजती, अनुगूँजती
कि जैसे पुकारती हैं
तुम्हेँ ही
फिर फिर
रामनारायण सोनी

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