मौन कितना बोलता तू सुन कभी
सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।
मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।
मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।
प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती
मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।
कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।
रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०

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