१
मैंने अपने भाव लिखे थे
तुम शब्दों में उलझ गये
शब्दों के अर्थों को लेकर
भाव गढ़े नित नये नये
२
शाखों से झरते फूलों को
तुमने पतझड़ ही कह डाला
पलकों पर ठहरे अश्रु को
खारा पानी ही कह डाला
३
अभी अभी उतरी मन आँगन
मेरी प्रीत जुन्हाई ले कर
वातायन क्यों बन्द कर लिये
अपनी ही तनहाई ले कर
४
कान लगा कर सुनो जरा तो
स्पन्दन के गीत बुने हैं
खिली साँझ की रोली ले कर
कितने कितने रंग चुने हैं
५
मंदिर के अर्चन की ध्वनियाँ
कोलाहल या शोर नहीं है
दीप आरती के पावन हैं
निरी अगन के ठौर नहीं है
६
इन शब्दों के पीछे पीछे
रेले चलते हैं भावों के
भाव मेरे सब प्रीति सने है
रस में डूबे अनुभावों के
७
इन गीतों में तुम ही तुम हो
अन्तस का आलाप तुम्ही
अन्तर के तारों से झरता
नाद तुम्ही अनुनाद तुम्ही
रामनारायण सोनी

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