*

*
*

Friday, 1 January 2021

भाव लिखे थे


   १
मैंने अपने भाव लिखे थे
 तुम शब्दों में उलझ गये
   शब्दों के अर्थों को लेकर
     भाव गढ़े  नित नये नये

   २
शाखों से झरते फूलों को
  तुमने पतझड़ ही कह डाला
   पलकों पर ठहरे अश्रु को
     खारा पानी ही कह डाला 

   ३
अभी अभी उतरी मन आँगन
 मेरी प्रीत जुन्हाई ले कर
  वातायन क्यों बन्द कर लिये 
   अपनी ही तनहाई ले कर

   ४
कान लगा कर सुनो जरा तो
 स्पन्दन के गीत बुने हैं
  खिली साँझ की रोली ले कर
   कितने कितने रंग चुने हैं

   ५
मंदिर के अर्चन की ध्वनियाँ
 कोलाहल या शोर नहीं है
  दीप आरती के पावन हैं
   निरी अगन के ठौर नहीं है

   ६
इन शब्दों के पीछे पीछे
 रेले चलते हैं भावों के
  भाव मेरे सब प्रीति सने है
    रस में डूबे अनुभावों के

   ७
इन गीतों में तुम ही तुम हो
 अन्तस का आलाप तुम्ही
  अन्तर के तारों से झरता
   नाद तुम्ही अनुनाद तुम्ही

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन