*

*
*

Thursday, 4 March 2021

प्रेमकुटी छाई है

नयनों के पथ से आये तुम
अन्तःपुर के खोल किवारे
दिल की प्रेमकुटी में टाँगे 
मैंने प्रीत के  बन्दनवारे

बेंदी माँडों म्हावर माँडो
काजर लाओ, चौक पुराओ
धानी चूनर कोई रंगा दो
देहरी जगमग दीप धराओ

वासन्ती रस रंग रमी है
अंग अंग उमगी अंगनाई
मन की गली गली बजती है
साँसों की सरगम शहनाई

श्याम मेघ अलकावली ओढ़ी
चंचरीक की गुन गुन गाजी
पोर पोर पुरवाई महकी
नयन कोर कजराई आँजी

कोई दिठौना ठोड़़ी धर दो
नजर उतारो, डगर बुहारो
प्रेमनगर की पनिहारी हूँ
रंग पलाश के गागर डारो

रामनारायण सोनी


मौन छाया बोलती है

"मौन छाया बोलती है"

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

मौन है चिर प्रीत मेरी

मौन है चिर प्रीत मेरी शब्द के विनिमय नहीं है
नयन भींगे वेदना की धूप में अभिनय नहीं है
मौन रजनी, मौन परिमल, मौन है वाचाल तटिनी
मौन उर में बन्दिनी इस प्रीत का परिणय नहीं है
चल चलें फिर गाँव अपने, स्वप्न पाँखी खोल डैने
इस हृदय की प्यास का तो शोर से परिचय नहीं है
       
मौन अधरों के निलय की रक्तिमा कुछ कह रही है
इस निरे निस्पन्द में भी भाव सरिता बह रही है
इन पलक की ओट में ये पुतलियाँ कब चुप रही है
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल लें गलबाँह अपनी
इस नगर की धुन्ध में तो सूझता कुछ भी नहीं है

सीख ले इस मौन से तू इस गगन के इस धरा के
गीत सुन तू भाल विधु की चाँदनी की उस सुरा के
धड़कनों की मौन कथनी कह रही मन की त्वरा के
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल दें अनुबन्ध सारे
प्रीत की पावन नगर में सुर सजा लें उर धरा के

रामनारायण सोनी
२५.०१.२०२१

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम द्वार किसी के मत जाना

मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो

           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।

            तुम द्वार अन्य के मत जाना
            तुम गीत वृथा के मत गाना🌹

     रामनारायण सोनी
      १२.०१.२१

यहीं तो हो तुम!

मन मीत मेरे!
आज अन्तस के
कुम्हलाए पुष्प फिर खिल उठे
जैसे तुम यहीं तो हो
मैंने तो बस सरगम का 
आलाप भर दिया था
पर तुमने कानों में उँडेल दिया
पूरा का पूरा राग विहाग
लगता है जैसे
यहीं तो हो
नही! नहीं!! यहीं हो तुम !!!

जब तुम न थी

तुम न थी, जब तुम न थी

तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन