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Thursday, 4 March 2021
प्रेमकुटी छाई है
मौन छाया बोलती है
मौन है चिर प्रीत मेरी
शब्द में हैं अर्चनाएँ
है अभी तो रक्त में
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।
रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।
रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०
तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ
रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०
तुम द्वार किसी के मत जाना
मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।
तुम द्वार अन्य के मत जाना
तुम गीत वृथा के मत गाना🌹
रामनारायण सोनी
१२.०१.२१
यहीं तो हो तुम!
जब तुम न थी
तुम न थी, जब तुम न थी
तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
रामनारायण सोनी
११.१२.२०
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन