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Thursday, 4 March 2021

प्रेमकुटी छाई है

नयनों के पथ से आये तुम
अन्तःपुर के खोल किवारे
दिल की प्रेमकुटी में टाँगे 
मैंने प्रीत के  बन्दनवारे

बेंदी माँडों म्हावर माँडो
काजर लाओ, चौक पुराओ
धानी चूनर कोई रंगा दो
देहरी जगमग दीप धराओ

वासन्ती रस रंग रमी है
अंग अंग उमगी अंगनाई
मन की गली गली बजती है
साँसों की सरगम शहनाई

श्याम मेघ अलकावली ओढ़ी
चंचरीक की गुन गुन गाजी
पोर पोर पुरवाई महकी
नयन कोर कजराई आँजी

कोई दिठौना ठोड़़ी धर दो
नजर उतारो, डगर बुहारो
प्रेमनगर की पनिहारी हूँ
रंग पलाश के गागर डारो

रामनारायण सोनी


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन