मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।
तुम द्वार अन्य के मत जाना
तुम गीत वृथा के मत गाना🌹
रामनारायण सोनी
१२.०१.२१

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