मौन है चिर प्रीत मेरी शब्द के विनिमय नहीं है
नयन भींगे वेदना की धूप में अभिनय नहीं है
मौन रजनी, मौन परिमल, मौन है वाचाल तटिनी
मौन उर में बन्दिनी इस प्रीत का परिणय नहीं है
चल चलें फिर गाँव अपने, स्वप्न पाँखी खोल डैने
इस हृदय की प्यास का तो शोर से परिचय नहीं है
मौन अधरों के निलय की रक्तिमा कुछ कह रही है
इस निरे निस्पन्द में भी भाव सरिता बह रही है
इन पलक की ओट में ये पुतलियाँ कब चुप रही है
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल लें गलबाँह अपनी
इस नगर की धुन्ध में तो सूझता कुछ भी नहीं है
सीख ले इस मौन से तू इस गगन के इस धरा के
गीत सुन तू भाल विधु की चाँदनी की उस सुरा के
धड़कनों की मौन कथनी कह रही मन की त्वरा के
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल दें अनुबन्ध सारे
प्रीत की पावन नगर में सुर सजा लें उर धरा के
रामनारायण सोनी
२५.०१.२०२१

No comments:
Post a Comment