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Thursday, 4 March 2021

यहीं तो हो तुम!

मन मीत मेरे!
आज अन्तस के
कुम्हलाए पुष्प फिर खिल उठे
जैसे तुम यहीं तो हो
मैंने तो बस सरगम का 
आलाप भर दिया था
पर तुमने कानों में उँडेल दिया
पूरा का पूरा राग विहाग
लगता है जैसे
यहीं तो हो
नही! नहीं!! यहीं हो तुम !!!

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन