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Saturday, 8 September 2012

प्रेमदीप तुम दिपते रहना


** दिपते रहना  **

याद करो उस  स्वर्णिम पल को 
मृदुल करों से तुम्हें छुआ था 
चिनगी दान किया था तुमको 
प्रेमदीप तुम तपते रहना

स्वांसों के अंतिम प्रवास तक 
दूर क्षितिज के निकट गाँव में 
द्रवित ह्रदय का तरल सींच कर 
प्रेमदीप तुम  दिपते रहना 

अनछुई छुअन की सिहरन है 
अनखुले  कुटी के वातायन 
अनबुझे सपन की तपन लिए ही 
ज्योतिपुंज तुम झरते रहना 


              



  रामनारायण सोनी 

अभिव्यंजना



** निर्मल प्यार **

निर्मल प्यार की हवाएँ ये बहती रहें
कुछ सुरीली कथाएँ ये कहती रहें
जिन्हें सुन हम आगे बढ़ते रहें
निर्मलता से अपनी राहों पर चलते रहें

--मिताली --

दिनांक :09 सित 2012


Tuesday, 4 September 2012

मेरे अंतर में बस जाओ

01.08.2012

तुम मेरे अंतर में बस जाओ 
मैंने चाहा था कुछ लिखना भूल गया मुझको ही
विषयवस्तु केवल तुम थीं शेष शून्य सा शेष रहा
                  तुम अशेष अन्तर में थीं

तब से अब तक तुमको मैंने मुझ में ही ढूँढा है
शायद स्मृतियाँ तुम में भी यह प्रतिबिंब बना देंगी

मेरा विश्वास फलित होता है तुमको भी विश्वास रहा है
आज चुनौती सुनो हमारी टीस हृदय में उपजा देगा

इसीलिये उद् घोष सुनो तुम अंतर अंतर का बंधन है
मैं तेरे अंतर में रम जाऊँ तुम मेरे अंतर में बस जाओ

                     तुम मेरे अंतर में बस जाओ 


01.08.2012                            रामनारायण सोनी 

Sunday, 2 September 2012

जब प्रीत जगी

 जब प्रीत जगी 
जब नयन बोलने लगे प्रीत के अंकुर फूटे 
अन्तर के सब भेद खुले भाव के निर्झर छूटे
बिन कहे निनादित प्राण-गीत के साज़ झनकते
बिन हिले अधर के आज सुने संवाद  ह्रदय के 
मन बोले मन सुने समझलो यही प्रीत की परिभाषा है
भावों का व्यापार चल पड़े यही प्रीत कि अभिलाषा है
गीतों का माधुर्य छंद में पाकर प्रीत तरुण होती है
जागे जब उल्लास हृदय में तब-तब प्रीत गहन होती है
उसके अन्तर की पीड़ा जब मुझमें तपिश जगाती है 
उसको काँटे चुभे पैर क्यों मुझमें टीस जगाती है 
उसके जीवन में तम छाये मुझमें क्यों संझवाती है
अन्तर के अनुबंधों को ही प्रीत सभी समझाती है
                                            रामनारायण सोनी  

बिंब में प्रतिबिंब

आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा ।

तुम अचानक खो गई थीं खो गया मेरा चमन
सो रहे थे नीड़ में यादें बने थे जो सपन
ले उठा अँगड़ाईयाँ आज विह्वल हो के मन
तुम नहीं थीं बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

लग गए थे पंख मन को मुक्त है आकाश ऊपर
प्रेम का सागर उमड़ कर आज झोली में सिमट कर
शुष्क उपवन में बहारें खिल उठी मधुमास बन कर
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

मौन थी सारी दिशाएँ, कुंद थी मेरी शिराएँ
मुग्ध था तन-मन अकम्पित, थिर रही मेरी निगाहें
मूक बन कर स्वास थामे, आज केवल सुन रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

आज कल में और कल में आज मिश्रित हो रहा
है वही अंदाज़ स्वर में भाव मुखरित हो रहा
बुत बना सुकुमार मन को प्यार से मैं तक रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन