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Saturday, 22 September 2012
Saturday, 8 September 2012
प्रेमदीप तुम दिपते रहना
** दिपते रहना **
याद करो उस स्वर्णिम पल को
मृदुल करों से तुम्हें छुआ था
चिनगी दान किया था तुमको
प्रेमदीप तुम तपते रहना
स्वांसों के अंतिम प्रवास तक
दूर क्षितिज के निकट गाँव में
द्रवित ह्रदय का तरल सींच कर
प्रेमदीप तुम दिपते रहना
अनछुई छुअन की सिहरन है
अनखुले कुटी के वातायन
अनबुझे सपन की तपन लिए ही
ज्योतिपुंज तुम झरते रहना
रामनारायण सोनी
Tuesday, 4 September 2012
मेरे अंतर में बस जाओ
| 01.08.2012 |
तुम मेरे अंतर में बस जाओ |
| मैंने चाहा था कुछ लिखना भूल गया मुझको ही |
| विषयवस्तु केवल तुम थीं शेष शून्य सा शेष रहा |
| तुम अशेष अन्तर में थीं |
| तब से अब तक तुमको मैंने मुझ में ही ढूँढा है |
| शायद स्मृतियाँ तुम में भी यह
प्रतिबिंब बना देंगी |
| मेरा विश्वास फलित होता है तुमको भी विश्वास रहा है |
| आज चुनौती सुनो हमारी टीस हृदय
में उपजा देगा |
| इसीलिये उद् घोष सुनो तुम अंतर अंतर का बंधन है |
| मैं तेरे अंतर में रम जाऊँ तुम
मेरे अंतर में बस जाओ |
| तुम मेरे अंतर में बस जाओ |
| 01.08.2012 रामनारायण सोनी |
Monday, 3 September 2012
Sunday, 2 September 2012
जब प्रीत जगी
|
बिंब में प्रतिबिंब
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा ।
तुम अचानक खो गई थीं खो गया मेरा चमन
सो रहे थे नीड़ में यादें बने थे जो सपन
ले उठा अँगड़ाईयाँ आज विह्वल हो के मन
तुम नहीं थीं बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
लग गए थे पंख मन को मुक्त है आकाश ऊपर
प्रेम का सागर उमड़ कर आज झोली में सिमट कर
शुष्क उपवन में बहारें खिल उठी मधुमास बन कर
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
मौन थी सारी दिशाएँ, कुंद थी मेरी शिराएँ
मुग्ध था तन-मन अकम्पित, थिर रही मेरी निगाहें
मूक बन कर स्वास थामे, आज केवल सुन रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
आज कल में और कल में आज मिश्रित हो रहा
है वही अंदाज़ स्वर में भाव मुखरित हो रहा
बुत बना सुकुमार मन को प्यार से मैं तक रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
रामनारायण सोनी
तुम अचानक खो गई थीं खो गया मेरा चमन
सो रहे थे नीड़ में यादें बने थे जो सपन
ले उठा अँगड़ाईयाँ आज विह्वल हो के मन
तुम नहीं थीं बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
लग गए थे पंख मन को मुक्त है आकाश ऊपर
प्रेम का सागर उमड़ कर आज झोली में सिमट कर
शुष्क उपवन में बहारें खिल उठी मधुमास बन कर
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
मौन थी सारी दिशाएँ, कुंद थी मेरी शिराएँ
मुग्ध था तन-मन अकम्पित, थिर रही मेरी निगाहें
मूक बन कर स्वास थामे, आज केवल सुन रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
आज कल में और कल में आज मिश्रित हो रहा
है वही अंदाज़ स्वर में भाव मुखरित हो रहा
बुत बना सुकुमार मन को प्यार से मैं तक रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।
रामनारायण सोनी
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन








