** दिपते रहना **
याद करो उस स्वर्णिम पल को
मृदुल करों से तुम्हें छुआ था
चिनगी दान किया था तुमको
प्रेमदीप तुम तपते रहना
स्वांसों के अंतिम प्रवास तक
दूर क्षितिज के निकट गाँव में
द्रवित ह्रदय का तरल सींच कर
प्रेमदीप तुम दिपते रहना
अनछुई छुअन की सिहरन है
अनखुले कुटी के वातायन
अनबुझे सपन की तपन लिए ही
ज्योतिपुंज तुम झरते रहना
रामनारायण सोनी


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