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Sunday, 2 September 2012

बिंब में प्रतिबिंब

आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा ।

तुम अचानक खो गई थीं खो गया मेरा चमन
सो रहे थे नीड़ में यादें बने थे जो सपन
ले उठा अँगड़ाईयाँ आज विह्वल हो के मन
तुम नहीं थीं बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

लग गए थे पंख मन को मुक्त है आकाश ऊपर
प्रेम का सागर उमड़ कर आज झोली में सिमट कर
शुष्क उपवन में बहारें खिल उठी मधुमास बन कर
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

मौन थी सारी दिशाएँ, कुंद थी मेरी शिराएँ
मुग्ध था तन-मन अकम्पित, थिर रही मेरी निगाहें
मूक बन कर स्वास थामे, आज केवल सुन रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

आज कल में और कल में आज मिश्रित हो रहा
है वही अंदाज़ स्वर में भाव मुखरित हो रहा
बुत बना सुकुमार मन को प्यार से मैं तक रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन