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Sunday, 2 September 2012

जब प्रीत जगी

 जब प्रीत जगी 
जब नयन बोलने लगे प्रीत के अंकुर फूटे 
अन्तर के सब भेद खुले भाव के निर्झर छूटे
बिन कहे निनादित प्राण-गीत के साज़ झनकते
बिन हिले अधर के आज सुने संवाद  ह्रदय के 
मन बोले मन सुने समझलो यही प्रीत की परिभाषा है
भावों का व्यापार चल पड़े यही प्रीत कि अभिलाषा है
गीतों का माधुर्य छंद में पाकर प्रीत तरुण होती है
जागे जब उल्लास हृदय में तब-तब प्रीत गहन होती है
उसके अन्तर की पीड़ा जब मुझमें तपिश जगाती है 
उसको काँटे चुभे पैर क्यों मुझमें टीस जगाती है 
उसके जीवन में तम छाये मुझमें क्यों संझवाती है
अन्तर के अनुबंधों को ही प्रीत सभी समझाती है
                                            रामनारायण सोनी  

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन