| जब प्रीत जगी |
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| जब नयन बोलने लगे प्रीत के अंकुर फूटे |
| अन्तर के सब भेद खुले भाव के निर्झर छूटे |
| बिन कहे निनादित प्राण-गीत के साज़ झनकते |
| बिन हिले अधर के आज सुने संवाद ह्रदय के |
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| मन बोले मन सुने समझलो यही प्रीत की परिभाषा है |
| भावों का व्यापार चल पड़े यही प्रीत कि अभिलाषा है |
| गीतों का माधुर्य छंद में पाकर प्रीत तरुण होती है |
| जागे जब उल्लास हृदय में तब-तब प्रीत गहन होती है |
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| उसके अन्तर की पीड़ा जब मुझमें तपिश जगाती है |
| उसको काँटे चुभे पैर क्यों मुझमें टीस जगाती है |
| उसके जीवन में तम छाये मुझमें क्यों संझवाती है |
| अन्तर के अनुबंधों को ही प्रीत सभी समझाती है |
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| रामनारायण सोनी |
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