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Thursday, 26 January 2017

🌴मैं इसी धरा की बेटी हूँ🌳



🌴मैं इसी धरा की बेटी हूँ🌳

पाञ्चजन्य के आदिम युग की 
मैं पोषक और संवाहक हूँ
यह प्रकृति है मेरी माता और
है वनस्थली आँगन मेरा।।

महुए की महकी सौरभ है
है अमलतास का पीत वसन
इनके झरते मकरंदों से
नित होता है श्रृंगार मेरा।।

ये शैल शिखर बहते झरने
और वन्य जीव सहचर मेरा
मन्द पवन के शीतल झोंके
इनने जीवन में गीत भरा।।

अपने सक्षम काँधों पर ही
परिजन का पोषण ढोती हूँ
अपने साहस के बल पर ही
निर्भय स्वच्छन्द विचरती हूँ।।

तू मेरे गीतों को

तू मेरे गीतों को, मैं तेरी आवाज लिए फिरता हूँ
बिन जुड़े बिन कहे न ये खो जाएँ अँधेरों में
न मिले संग अगर नाव और माँझी का

त्रिवेणी तो संगम है तीन नदियों का
देखते हैं गंगा जमना को तो सभी
सरस्वती को गुनिजन ही देखते हैं


आजकल मैं बहुत कन्फ्यूज्ड हूँ
हर बरस कोई मेहमान आता है
अपना नाम कुछ बताता है

Wednesday, 18 January 2017

काजल की कोर से


इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

आँसू न न समझ ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल में गहरे खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी आँखों की कोर से
मीठे से तेरे दिल को करदे ये खारा नहीं कहीं।

दुआएँ जीने की

मिल गई मुझको दुआएँ जी भर के
सौ बरस जिन्दगी को जीने की 
पर बरस है हमारा ये कुछ दिन का
जिनको धागों में जमा रक्खा था
मनके टूट कर कुछ तो गिरे बालू में
ढूँढता उनको गर रहा होता मैं
गाँठ के पल भी और खोना था
भींच कर बैठा हूँ कुछ पल मुट्ठी में
जिन्दगी फूटी घड़े सी न चू जाए कहीं

तेरा लौट आना लाजमी है

घिर चले रंजो-गम के साए 
कहीं पूरा न निगल जाए मुझे
तेरी यादों के शोख परिन्दे
खो न जाए ये कहीं अम्बर में
बादलों से झाँकती रुपहली 
रोशनी भी न गुम जाए कहीं
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

मेरी इस नज्म की नब्ज
बड़ी मुश्किल से चल पाई है
लाल तपते हुए सेहरा में
बडी मुश्किल से बहार उतरी है
वादियाँ में है मेले खुशबुओं के
बगीचों को न लग जाए कहीं नजर
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

रात भर देते रहे दस्तक
अनजान हवा के झोंके
सहमा सहमा सा, कुछ डरा डरा सा है
दिल का क्या हाल मैं कहूँ तुझसे
कँपकंपाता दिया ये प्रेम का है
कहीं चुक जाए न तैल और बाती
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

Tuesday, 17 January 2017

बूढ़ी स्मृतियाँ













   😳 बूढ़ी स्मृतियाँ 🤕

बिल्लोरी काँच की ऐनक के
पीछे से एक जोड़ी नम आँखें
धुन्दियाती, चुन्धियाती आँखें
नीले विस्तीर्ण अम्बर पर छितरे
श्वेत श्याम बादलों में गड़ जाती है
सहसा उभरता है बेटे का बचपन
खिलखिलाता रेशमी एहसास सा
तभी वक्त की बहकी हवाएँ चली 
बादल बिखर गए गल गल कर 
टूटी तन्द्रा, पसर गई नीरवता
   जिन्दगी तार-तार, निराधार
   शून्य ही शून्य चहुँ ओर

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

बचपन जो उसकी गोद खेला
अपनी काँपती उंगलियोँ में अब
उस बेटे की छुअन को ढूँढता है
उम्र से झुके इन काँधों पर 
बैठे मचलते उस बचपन के
महसूस करता है भार को
तब ये काँधे जवान थे
हाथों में भी कर्म के संधान थे
अब अहसास का बोझ भी असह्य है
शिराएँ मन्द हैं, धमनियाँ निष्पन्द हैं
इधर तन गला गला, मन बुझा बुझा
बातें सिर्फ फजाएँ ही सुनती है
आशाएँ अपने हाथों सिर धुनती हैं
  फिर भी आशीष को उठे हाथ
  दिशाओं में फैल जाते हैं

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

किस कदर ये पीढ़ियाँ बदल गई
संस्कृति पूरी की पूरी निगल गई
संवेदनाएँ श्मसान में और
श्मसान चौराहे पर खड़ा है
विश्व-गुरू की आकाँक्षा, आदर्श लिए
राष्ट्र कितना बेसुध पड़ा है
अतीत की पोटली से सोनचिरैया 
चीख चीख दुनिया को  दिखाते हैं
स्वर्ण कूड़े के बदले बिक चुका है
चिरैया बेजान खिलौना हो चुका है
   जानती नहीं पीढ़ियों की ये भेड़ें
   एक दिन इसी गर्त में वे ही गिरनी है।

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार





Monday, 16 January 2017

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त 
होती अलियों की मधुर तान 
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन