*

*
*

Monday, 16 January 2017

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त 
होती अलियों की मधुर तान 
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन