पाञ्चजन्य के आदिम युग की
मैं पोषक और संवाहक हूँ
यह प्रकृति है मेरी माता और
है वनस्थली आँगन मेरा।।
महुए की महकी सौरभ है
है अमलतास का पीत वसन
इनके झरते मकरंदों से
नित होता है श्रृंगार मेरा।।
ये शैल शिखर बहते झरने
और वन्य जीव सहचर मेरा
मन्द पवन के शीतल झोंके
इनने जीवन में गीत भरा।।
अपने सक्षम काँधों पर ही
परिजन का पोषण ढोती हूँ
अपने साहस के बल पर ही
निर्भय स्वच्छन्द विचरती हूँ।।
मैं पोषक और संवाहक हूँ
यह प्रकृति है मेरी माता और
है वनस्थली आँगन मेरा।।
महुए की महकी सौरभ है
है अमलतास का पीत वसन
इनके झरते मकरंदों से
नित होता है श्रृंगार मेरा।।
ये शैल शिखर बहते झरने
और वन्य जीव सहचर मेरा
मन्द पवन के शीतल झोंके
इनने जीवन में गीत भरा।।
अपने सक्षम काँधों पर ही
परिजन का पोषण ढोती हूँ
अपने साहस के बल पर ही
निर्भय स्वच्छन्द विचरती हूँ।।


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