*

*
*

Wednesday, 18 January 2017

काजल की कोर से


इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

आँसू न न समझ ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल में गहरे खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी आँखों की कोर से
मीठे से तेरे दिल को करदे ये खारा नहीं कहीं।

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन