इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
आँसू न न समझ ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल में गहरे खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी आँखों की कोर से
मीठे से तेरे दिल को करदे ये खारा नहीं कहीं।


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