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Monday, 17 April 2017

तुम्हे याद हो के न याद हो

तुम्हे याद हो के न याद हो

मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
वो आँगन की लिजलिजी सी मिट्टी,
बनती कभी मरहम दिल का
वो फर्श पर पड़ी धूल पे ताजा पाँव के निशान,
करती बयाँ कि तुम यहीं कहीं हो
वो डायरी के कुछ फड़फड़ाते पन्ने
जिनमें इबारतें तेरे मेरे इश्क की ही हैं
वो रोशनदान से झाँकती मद्दम रोशनी में
अगरबत्ती का धुआँ बनाता नगरकोट
तुम्हे याद हो के न याद हो।।

वो पेशानी पर पड़ी चंद सिलवटें
चूमती गुनगुनी बदन की झुरझुरी
वो शबनमी आखें बोझल पलकों में दबीं
कहती, सुनती, लरजती कुछ कुछ
वो खिड़की पर टिका अनमना खामोश चेहरा
वो इन्तज़ार करती उल्टी भीगी छतरी
फुहारों की फुनगी लगाए खड़ी
वो शाम के धुँधलके से उभरता अक्स
गली पर, मोड़ पर, साँस के दौर पर
दबे पाँव कोई सहमता, गुजरता जाता
तुम्हें याद हो के न याद हो।।

मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
तुम्हें याद हो के न याद हो।।

Sunday, 5 February 2017

एक गुजराती गीत








https://www.youtube.com/watch?v=rqfYxAANwDY
एक गुजराती गीत

🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄

🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄

जागा मधुमास मधुर मन के अरण्य में
किसलय-कलिकाएँ बनती अनल बीज।
दग्ध हुआ शिशिर का वह सघन शीत
ले आया रसवन्ती रसधारा भी सरसिज।।

पगलाया पवन भी ले कर के गन्ध-भार
गदराई अमराई भरती सी मदमत्त धार।
आँगन में उपवन में वीथिन में कुंजन में
बिखरी मधुरस की रसना रसमय अपार।।

शैल बने कनक-श्रृंग स्वर्णिम सी ऊषा में 
पहन लिये पीत वसन अमलतास, सरसों ने ।
ढाँप लिया अग-जग को फूलों की चूनर ने 
फैलाई अगरु गंध जन-जीवन में ऋतुपति ने।।

नव पल्लव नवल लता ले कर के नव विहान
गुंफित अवगुंठित हो रचते सब नव वितान।
अलियों के वृंद-वृंद करते मिल वृन्दगान
मधुपरियाँ जी भर कर करती मकरन्द पान।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

🍫"सिरहाने से"🍢

नज़्म :-


"सिरहाने से"

तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है

जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन 
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती 
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है


थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है

शकुन्तला सोनी
(रामनारायण सोनी)

Thursday, 26 January 2017

🌴मैं इसी धरा की बेटी हूँ🌳



🌴मैं इसी धरा की बेटी हूँ🌳

पाञ्चजन्य के आदिम युग की 
मैं पोषक और संवाहक हूँ
यह प्रकृति है मेरी माता और
है वनस्थली आँगन मेरा।।

महुए की महकी सौरभ है
है अमलतास का पीत वसन
इनके झरते मकरंदों से
नित होता है श्रृंगार मेरा।।

ये शैल शिखर बहते झरने
और वन्य जीव सहचर मेरा
मन्द पवन के शीतल झोंके
इनने जीवन में गीत भरा।।

अपने सक्षम काँधों पर ही
परिजन का पोषण ढोती हूँ
अपने साहस के बल पर ही
निर्भय स्वच्छन्द विचरती हूँ।।

तू मेरे गीतों को

तू मेरे गीतों को, मैं तेरी आवाज लिए फिरता हूँ
बिन जुड़े बिन कहे न ये खो जाएँ अँधेरों में
न मिले संग अगर नाव और माँझी का

त्रिवेणी तो संगम है तीन नदियों का
देखते हैं गंगा जमना को तो सभी
सरस्वती को गुनिजन ही देखते हैं


आजकल मैं बहुत कन्फ्यूज्ड हूँ
हर बरस कोई मेहमान आता है
अपना नाम कुछ बताता है

Wednesday, 18 January 2017

काजल की कोर से


इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

आँसू न न समझ ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल में गहरे खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी आँखों की कोर से
मीठे से तेरे दिल को करदे ये खारा नहीं कहीं।

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