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Wednesday, 28 June 2017
पावस रिझाने आ गई
नृत्य करता पवन पागल, ताल पीपल पात भरते
श्रृंग शिखरों पर नशीले मेघ अपना तन सिरजते
प्रेमियों की उर-धरा पर प्रीत बन कर छा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
श्रृंग शिखरों पर नशीले मेघ अपना तन सिरजते
प्रेमियों की उर-धरा पर प्रीत बन कर छा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
भींग लें समवेत हो हम मेघना मल्हार गाती
रेशमी फर सी फुहारें झिरमिराते सुर जगाती
खोल लें हर गाँठ मन की रुत छबीली आ रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
रेशमी फर सी फुहारें झिरमिराते सुर जगाती
खोल लें हर गाँठ मन की रुत छबीली आ रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
कूक बनती हूक सी पिउ प्रीत की पाती बना है
मेघना की मांग भर दूँ, मेघ की रुचि-एषणा है
चंचला ले दुति-पताका लरजती लहरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
मेघना की मांग भर दूँ, मेघ की रुचि-एषणा है
चंचला ले दुति-पताका लरजती लहरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
चढ़ हिंडोले श्रावणी के युगल झूलें आम्रवन में
गा उठे आल्हा कहीं कजरी कहीं बिरहा यमन में
सौंधियाती हरित वसना यह धरा इतरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
गा उठे आल्हा कहीं कजरी कहीं बिरहा यमन में
सौंधियाती हरित वसना यह धरा इतरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
बूँद उलझे कुंतलों में माल-वेणी से गुँथे हैं
टिप-टिपाते हैं पनाले रागिनी के सुर बंधे हैं
यह मदिर वर्षा प्रणय की सेज बनती जा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
टिप-टिपाते हैं पनाले रागिनी के सुर बंधे हैं
यह मदिर वर्षा प्रणय की सेज बनती जा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
रामनारायण सोनी
Monday, 26 June 2017
दीपा
संघर्ष सारा दीप का तम से नही खुद से हुआ
ढूँढता है संग किसका क्षुब्द क्यों सब से हुआ
यह व्यथा व्यतिरेक की अभिव्यंजना है
कर्म पथ है किरण पथ ही क्यों कहें उद्वेलना है
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Wednesday, 21 June 2017
पंख लगे पल
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा
कभी नयन लजाते
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
आशाएँ, निराशाएँ, हताशाएँ
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
रामनारायण सोनी
Monday, 19 June 2017
मैं जला हूँ दीप बन कर
*मैं जला हूँ दीप बन कर*
मैं तमिस्रा में जला हूँ दीप बन कर
तैल की इक बूँद भी ना शेष होगी।
गंध बुझती बातियों की जब लगे
प्रिय तुम्हारी प्रीत ही अवशेष होगी।।
तैल की इक बूँद भी ना शेष होगी।
गंध बुझती बातियों की जब लगे
प्रिय तुम्हारी प्रीत ही अवशेष होगी।।
अंक में ज्वाला समेटे उम्र भर से
जो तिरोहित हो रही नित रश्मियाँ।
पन्थ में तेरे बिछी है आस बन कर
प्रस्तरों के भार सहती संधियाँ।।
जो तिरोहित हो रही नित रश्मियाँ।
पन्थ में तेरे बिछी है आस बन कर
प्रस्तरों के भार सहती संधियाँ।।
सांझ से ही चिर प्रतीक्षा जागती है
हर निशा ही व्यंजना लेकर खड़ी है।
भोर तक है साध में यह लौ अकंपित
भग्न अधरों पर पिपासा हर घड़ी है।।
हर निशा ही व्यंजना लेकर खड़ी है।
भोर तक है साध में यह लौ अकंपित
भग्न अधरों पर पिपासा हर घड़ी है।।
प्राण में हर पल निरे निःश्वास ही है
जिन्दगी कण-कण तिमिर में घुल रही।
बंधनाएँ वर्जना बस प्राण की है
थाम कर इन धड़कनों को चल रहीं।।
जिन्दगी कण-कण तिमिर में घुल रही।
बंधनाएँ वर्जना बस प्राण की है
थाम कर इन धड़कनों को चल रहीं।।
Sunday, 18 June 2017
कविता ने जगा दिया
बड़े सवेरे आज मेरी कविता ने मुझे जगा दिया
तंद्रा टूट न पाई थी कुछ कानों में बुदबुदा दिया
रोज मुझे तुम ले जाते हो अपनी टर्र सुनाते हो
चाहो बस वह कहती हूँ मैं आज तुम्हें ले जाऊँगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
तंद्रा टूट न पाई थी कुछ कानों में बुदबुदा दिया
रोज मुझे तुम ले जाते हो अपनी टर्र सुनाते हो
चाहो बस वह कहती हूँ मैं आज तुम्हें ले जाऊँगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
तुमने अम्बर पट पर ऊषा का अरुणिम देखा है
पंछी के कलरव सुने अभी यह मंगल तुमने देखा है
तपती धरती पर नंगे पग जीवन के रिसते वे छाले
ढली सांझ भूखे लौटे उन बच्चों से मिलवाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
पंछी के कलरव सुने अभी यह मंगल तुमने देखा है
तपती धरती पर नंगे पग जीवन के रिसते वे छाले
ढली सांझ भूखे लौटे उन बच्चों से मिलवाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
तुम रहे डोलते मस्ती में मस्तों की अल्हड़ टोली में
रसवन्ती रसना में डूबे रसिकों की रसमय बोली में
उन सूखे कंठों, अधरों में करती नृत्य पिपासा में
बच्चों बूढ़ों की आशा के मरघट तुम्हें दिखाऊँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
रसवन्ती रसना में डूबे रसिकों की रसमय बोली में
उन सूखे कंठों, अधरों में करती नृत्य पिपासा में
बच्चों बूढ़ों की आशा के मरघट तुम्हें दिखाऊँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
घोड़ों संग दौड़ रही दौलत दाँवों पर दाँव लगे देखे
अंकों की मंडी शाम सुबह वे खुल कर बंद हुए देखे
पर पल पल चूते जीवन की गागर में जहँ दर्द भरे
उन आहों और कराहों का परिचय तुम्हें कराऊंगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
अंकों की मंडी शाम सुबह वे खुल कर बंद हुए देखे
पर पल पल चूते जीवन की गागर में जहँ दर्द भरे
उन आहों और कराहों का परिचय तुम्हें कराऊंगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
तुमने छ्त से लटके रोशन फानूस कई देखे होंगे
उनसे रोशन रिश्तों के हमराज कई देखे होंगे
गुमनाम अंधेरी गलियों में वे चीख रहे हैं सन्नाटे
टिम टिम करता मिट्टी का दीपक तुमको दिखलाउँगी।
उनसे रोशन रिश्तों के हमराज कई देखे होंगे
गुमनाम अंधेरी गलियों में वे चीख रहे हैं सन्नाटे
टिम टिम करता मिट्टी का दीपक तुमको दिखलाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।
Tuesday, 13 June 2017
आतंकवाद
कौन है जो इन युवाओं में पलीते धर रहा
छीन कर पुरुषार्थ उनमें विप्लवों को बो रहा।
उन जड़ों की ठीक से पहिचान करनी चाहिए
क्यारियाँ केशर की उजड़ी नागफनियाँ धर रहा।।
छीन कर पुरुषार्थ उनमें विप्लवों को बो रहा।
उन जड़ों की ठीक से पहिचान करनी चाहिए
क्यारियाँ केशर की उजड़ी नागफनियाँ धर रहा।।
वक्त है आह्वान का तुम शक्ति का संधान कर लो
अब कसो तूणीर उनमें रण विजय के तीर धर लो।
है धरा के ऋण चुकाने का समय अभिनव खड़ा
धार में अपने परशु को तीक्ष्ण करके आग भर लो।।
अब कसो तूणीर उनमें रण विजय के तीर धर लो।
है धरा के ऋण चुकाने का समय अभिनव खड़ा
धार में अपने परशु को तीक्ष्ण करके आग भर लो।।
जो उठी है विष भरी संभावनाएँ अरिदलों में
शांति के उड़ते कपोतों को लहू से रंग रहे।
नष्ट कर दो ताकतों को जो अनर्गल हो रही
वे नहीं मानव जगत में हिंस्र कितने हो रहे।।
शांति के उड़ते कपोतों को लहू से रंग रहे।
नष्ट कर दो ताकतों को जो अनर्गल हो रही
वे नहीं मानव जगत में हिंस्र कितने हो रहे।।
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन