भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
संघर्ष सारा दीप का तम से नही खुद से हुआ ढूँढता है संग किसका क्षुब्द क्यों सब से हुआ यह व्यथा व्यतिरेक की अभिव्यंजना है कर्म पथ है किरण पथ ही क्यों कहें उद्वेलना है
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