पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा
कभी नयन लजाते
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
आशाएँ, निराशाएँ, हताशाएँ
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर
बहुत सा छीन ले जाते पल
रामनारायण सोनी

No comments:
Post a Comment